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दोहे

राजनीती 


राजनीति तेरा हुआ उफ़! ये केसा हाल
जो भी मुर्गा बाँग दे उसको करे हलाल

लोकतंत्र दिखला रहा रोज अनोखे सीन 
नाच दिखाएँ नेवले, नाग बजाएँ बीन 

सहते गीदड़ भिभकियाँ कभी न होते क्रुद्ध
राजाजी कर लीजिए अब निर्णायक युद्ध 

नेता बाजीगर हुए नित्य दिखाते खेल 
पत्थर से पत्थर रगड़ ये निकालते तेल 

साफ़ नज़र आता नहीं किस रास्ते पर हिंद 
लोकतंत्र कि आंख मैं हुआ मोतियाबिंद



पानी नदिया प्यास 

हुई प्यास से अधमरी, काला पड़ा शरीर।
दिल्ली के दरबार में, नदिया माँगे नीर॥

 लिये होंठ सूखे, समय पूछे यही सवाल।
किधर गया, कल था यहाँ पानी वाला ताल॥

ना जाने किस मोड़ पर चेतेगा इंसान।
 पानी-पानी हो रही, पानी की पहचान॥

 सार्वजनिक नल बंद हैं, प्याऊ हैं लाचार।
लगे हुए हैं हर तरफ, पानी के बाज़ार॥

नदिया अमृत बाँटकर, खुद करती विषपान।
 पता नहीं किस मोड़ पर दे दे अपनी जान॥

किस विकास के खुल गए, यारों आज किवाड़।
डरे-डरे हतप्रभ खड़े, जंगल, नदी, पहाड़॥

किस विकास की दौड़ में, रहा न कुछ भी याद।
जीव-जन्तु, जंगल सभी, पानी के अनुवाद॥

जीवन एक निबंध-सा, यों पाये विस्तार।
पानी ही प्रस्तावना, पानी उपसंहार॥

हरी-भरी रचना सभी, ठहर, समझ, पढ़, देख।
 कितने पानीदार हैं, पानी के आलेख॥

 नित पानी का दायरा, हुआ अगर यूँ तंग।
पानी की खातिर न हो, यारो अगली जंग॥

 राजन पर उत्तर नहीं, हतप्रभ है बेताल।
कहाँ शहर से गुम हुए, सारे पोखर-ताल ॥

 नदिया कहे कराह के, दे ले अब तो घाव।
कभी नाव में है नदी, कभी नदी में नाव॥

नदिया चली पहाड़ से, मन में ले उल्लास।
जब आई मैदान में, पग-पग पसरी प्यास॥

जल ये जल-जलकर कहे, चेत अरे इंसान।
तरसाऊँगा कल तुझे ले मत मेरी जान॥

 खोदे गए मकान जब, कुछ नगरों के पास।
हर मकान की नींव में थी पोखर की लाश॥

जल ने मल में डूबकर, दिया मनुज को शाप। '
दुख झेलेंगी पीढ़ियाँ, जल-जल करते जाप॥'

 सागर बोला-री नदी! कैसी थी वो राह?
नदी सुबकने लग गई, मुँह से निकली आह॥

जल जहरीला हो गया, पी-पीकर तेज़ाब।
ऐ विकास! तू धन्य है, माँगे कौन जवाब॥

जल पहुँचा पाताल में, नभ पर पहुँचे लोग।
 काली नदिया बह रही, लेकर अनगिन रोग॥

 हम नदिया के तट खड़े, ले आँखों में नीर।
 प्यासी नदिया की विवश बाँट रहे तकदीर॥

 खेल अनोखे खेलता, दिल्ली का दरबार।
आँखों में पानी नहीं, किससे करें गुहार॥